साकेत’ महाकाव्य-मैथिलीशरण गुप्त ’’आदर्श नारी चारित्र की उदभावना’

पुष्पलता चिलुका

Abstract


महाकाव्यों की परम्परा में ’रामचारित चिन्तामणि’ के बाद मैथिलीशरण गुप्त के ’साकेत’ (1929 ई.) का नाम आता है। इसमें कवि ने परम्परागत परिपाटी का अनुकरण करते हुए अनेक मौलिक विशेषताओं की सृष्टि की है। यह एक सर्ग बध्द रचना है। इसमें आठ से अधिक बारह सर्ग हैं। कथानक लोकविश्रुत रामकथा है। विप्रलम्भ श्रृंगार की प्रधानता है, करूण, वीर,  रौद्र आदि रस उसके सहायक हैं। गुप्त जी ने नारी को भारतीय आदर्श के ढालने की चेष्टा की है। भौतिक पक्क्ष में नारी ’रति’ का प्रतिरूप है, वह विश्व की मधुर कल्पना है। अतः नारी परुष की अनिवार्य आवश्यकता के रूप में प्रकट हुई है। साथ ही बौध्दिक क्षेत्र में वह उच्च है। हृदय की विशालता तथा सहानभुति उसके आभूषण रहे हैं।’साकेत’ एक चरित्र प्रधान काव्य है। उसमें उर्मिला का चरित्र कथा से सम्बन्धित अन्य पात्रों के मध्य विकसित होता है। यधपि यह बात अवश्य है कि गुप्तजी को अनेक स्थलों पर कला में परिवर्तन करना पड़ा है। जिससे उनके महाकाव्य में मौलिकता का समावेश हो गया है। वैसे मूलतः यह कथा ’वाल्मीकि रामायण तथा रामचरित मानस’ से सम्बन्धित है। एसे काव्य की सफलता के लिए आवश्यक है कि उसके सभी पात्र मुख्य पात्र के चरित्र पर घात प्रतिघात व्दारा प्रभाव डालें। इस दृश्टि से ’साकेत’ एक सफल काव्य माना जाता है। उसके सभी पात्रों का सम्बन्ध प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से उर्मिला के चरित्र से सम्बन्धित रहता है।

Keywords


नारी, सहानभुति, आभूषण, सम्बन्धित

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