आखिर क्यों? जानें मानसिक विषमता को

हर्षित गर्ग, प्रणव ईश

Abstract


मानसिक बीमारी का नाम सुनते ही आम तौर पे लोग कुछ विचित्र सी प्रतिक्रिया देने लग जाते हैं। कोई इसको अमानवीय मानता है। कोई प्रकोप बताता है। कोई कर्म का भोग बोलता है और कईं लोग इससे सिरे से नज़र अंदाज़ कर देते हैं। स्वयं को धार्मिक और पौराणिक ज्ञान के ज्ञाता भी इनके बारे में तर्क हीन व्यंग्य कसने से पीछे नहीं रहते। आम जन ही नहीं बल्कि चिकित्सक समाज के ज्ञानी भी मानसिक रोगों के प्रति उदासीन व्यवहार रखते हैं। इसके चलते वे दिमागी बीमारियों में काम आने वाली दवाओं को स्वयं ही मरीज़ को लिख देते हैं, बिना किसी मानसिक रोग विशेषज्ञ से परामर्श किये।   

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